भगवान को धन्यवाद देने से क्या होता है ? यह कहानी एक कृष्ण भगवान के भक्त की है


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गोकुल के पास ही एक गाँव में एक महिला रहती थी। इस महिला का नाम आनंदी बाई था। ये महिला देखने में इतना कुरूप थी की लोग इसे देखते ही डर जाते थे। गोकुल नगरी में उस महिला आनंदी बाई का विवाह हो गया। विवाह से पहले उसके पति ने उसे नहीं देखा था। विवाह के बाद जब उसके पति ने उसे देखा तो उसकी कुरूपता के कारण उसे अपना पत्नी के रूप में अस्वीकार कर दिया और उसे छोड़कर दूसरा विवाह कर लिया। आनंदी बाई ने अपनी इस कुरूपता के कारण हुई अपमान को दबा लिया और निश्चय किया कि - अब तो मैं गोकुल को ही अपना ससुराल बनाऊँगी। अब आनंदी बाई गोकुल के एक छोटे से कमरे में रहने लगी।

आनंदी बाई उस छोटे से घर में ही कृष्णा भगवान का मंदिर बनाकर श्रीकृष्ण की भक्ति में मस्त रहने लगी। अब वो सुबह शाम घर में विराजमान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ बातें करता, रूठ जाता और फिर उन्हें मनाती। वो दिन भर साधु संतों की सेवा करती और सत्संग सुनती। इस तरह साधु संतों की सेवा और श्रीकृष्ण की भक्ति में उसका दिन बीतने लगा। 

एक दिन की बात है गोकुल में गोपेश्वर नामक जगह पर श्रीकृष्ण लीला का आयोजन निश्चित किया गया था। इसके लिए अलग-अलग पात्रों का चयन हो रहा था। संयोग से जब पात्रो का चयन हो रहा था उस समय आनंदी बाई भी वहां मौजूद थी। अंत में जब कुब्जा की पात्र की बात चली तब उस वक्त वहां आनंदी का पति अपने दूसरे पत्नी और बच्चे के साथ वहीं पर मौजूद था। उसने आनंदी बाई का मजाक उड़ाते हुए आयोजको के आगे प्रस्ताव रखा की - ये जो सामने महिला खड़ी है वो कुब्जा की भूमिका अच्छी तरह से निभा सकती है। उसी से कहो कुब्जा की भूमिका निभाने के लिए। 

आयोजकों ने आनंदी बाई की ओर देखा और उसका कुरूप चेहरा उन्हें भी कुब्जा की भूमिका के लिए पसंद आ गई। उन्होंने आनंदीबाई से कुब्जा की भूमिका निभाने के लिए प्रार्थना की। श्रीकृष्ण लीला में भूमिका निभाने का मौका मिलेगा इतना जानकर की आनंदीबाई खुश हो रही थी। उसने कुब्जा की भूमिका निभाने के लिए हाँ बोल दी। श्रीकृष्ण का पात्र एक आठ वर्ष का बालक निभा रहा था। 

आनंदी बाई घर आकर कृष्ण की मूर्ति को निहारने लगी और मन ही मन विचार करने लगी की मेरी कन्हैया आयेगा और मेरे पैर पर पैर रखेगा और मेरी ठोढ़ी पकड़कर मुझे ऊपर देखने को कहेगा। अब क्या था आनंदीबाई नाटक के कल्पना के दृश्यों में ही खोने लगी। आखिरकार श्रीकृष्ण लीला को रंगमंच पर अभिनृत करने का समय आ ही गया। लीला देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए थे। 

श्रीकृष्ण की मथुरा गमन का प्रसंग चल रहा था। नगर के राजमार्गों से श्रीकृष्ण गुजर रहे थे की रास्ते में उन्हें कुब्जा मिली। आठ वर्षीय बालक जो श्रीकृष्ण का पात्र अदा कर रहा था उसने कुब्जा बनी हुई आनंदीबाई के पैर पर पैर रखा और उसकी ठोढ़ी पकड़कर उसे ऊँचा किया। किन्तु ये कैसा चमत्कार था - कुरूप कुब्जा एकदम सामान्य नारी के स्वरुप में आ गयी थी। वहां पर मौजूद सभी दर्शकों ने इस प्रसंग को अपनी आँखों से देख रहा था। 

आनंदीबाई की कुरूपता का पता सभी को था लेकिन अब उसकी कुरूपता बिलकुल गायब हो चुकी थी। ये देखकर सभी लोग अपने दाँतो तले ऊँगली दबाने लगा। आनंदीबाई तो भावविभोर होकर अपने कृष्ण भक्ति में ही खोयी हुई थी। उसकी कुरूपता नष्ट हो गई, ये जानकर कई लोग उसे देखने के लिए उसके घर पर आने लगे। लेकिन इस सब से आनंदीबाई को थोड़ा भी फर्क नहीं पड़ रहा था वो एकदम बिल्कुल अपने श्रीकृष्ण की भक्ति में खोए रहती थी। अगर कोई कुछ भी पूछता तो बस एक ही जबाब सभी को मिलता की - मेरे कन्हैया की लीला, मेरी कन्हैया ही जाने। 

आनंदी बाई ने इसके लिए अपने पति को धन्यवाद देने से पीछे नहीं हटी क्योंकि यदि उसकी कुरूपता के कारण उसके पति ने उसे छोड़ न दिया होता तो श्रीकृष्ण में उसकी भक्ति इतनी कैसे जागती। कृष्णलीला में कुब्जा के पात्र के चयन के लिए उसका नाम भी तो उसके पति ने ही लिखवाया था। इसके लिए वो अपने पति को आभार मानती थी। आनंदीबाई हमेशा अपने पति और कृष्णा भगवान को धन्यवाद देती थी। 

दोस्तों, इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है कि प्रतिकूल परिस्थितियों या हालातों में शिकायत करने की जगह हर परिस्थिति को भगवान का ही देन मानकर धन्यवाद देने से प्रतिकूल परिस्थिति भी उन्नति का कारन बन जाती है। इसलिए हर परिस्थिति में कहों - मेरे कान्हा जब से रखा है कदम तेरी चौखट पर, आसमान से भी ऊँचा मेरा सर लगता है, तेज आँधियाँ है फिर भी मैं रौशन हूँ, ये सिर्फ तेरी रहमतों का असर लगता है। 

हर परिस्थिति को भगवान का ही देंन मानकर उसे धन्यवाद देना चाहिए। ऐसा करने से विकट से विकट समस्याओं का भी समाधान हो जाता है।

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