अब तक का सबसे बेस्ट Motivational Story | एक सन्यासी की कहानी से सीखें - 101 Gyani

विष्णु प्रिया जी ने लिखें है की - सन्यास का अर्थ संसार को त्यागने और बाहरी वेशभूषा बदलने से नहीं है अपितु सन्यास का अर्थ सांसारिक वृत्तियों ( लोभ, मोह, माया और क्रोध ) का त्याग करने से है और इसका भाव तटस्थता और निर्लिप्तता से है ! 

 एक सन्यासी की कहानी

एक जंगल में सन्यासी रहता था | उनके दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते, जो भी आते उसे शांति मिलती थी | एक दिन उस राज्य के राजा भी वहां गए | सन्यासी एक वृक्ष के निचे बैठे थे क्योंकि सर्दी और वर्षा से बचने के लिए उनके पास कोई प्रबंध नहीं था | ये देखकर राजा बोले - महात्मन, यहाँ तो आपको बहुत कष्ट होता होगा ! आप मेरे साथ चलिए, महल में रहिए | 

सन्यासी ने मना कर दिया लेकिन राजा ने काफी जिद की तो वे जाने को राजी हो गए | महल में सन्यासी एक अच्छे कमरे में रुके जहाँ हर समय नौकर उपस्थित रहने लगा और अच्छा भोजन भी मिलने लगा | राजा और रानी दोनों उसकी पूजा करते थे | इसी तरह 30 दिन यानि महीनो बीत गए | 

एक दिन रानी नहाने गई और नहाने के बाद अपना कीमती हीरे का हार वहीँ भूल आई | रानी के बाद सन्यासी नहाने गया जहाँ उसे हीरे का हार दिखाई पड़ा, जिसे उन्होंने उठा कर अपने कमंडल में छिपा लिया और महल छोड़ कर भाग निकला | कुछ देर बाद रानी को ख्याल आया और हार ढूंढा गया तो महल में सबको पता चल गया की वो हार सन्यासी चोरी करके भाग निकले है | 

राजा ने सिपाहियों को उनकी खोज में भेज दिया | सन्यासी शहर से भागते हुए जंगल में जा पहुँचा और थक कर वहीँ रुक गए | जब उन्हें भूख लगी तो वहीँ उपस्थित एक फल को तोड़कर खाने लगे, लेकिन वह फल एक औषधि था जिसकी वजह से सन्यासी का पेट ख़राब हो गया, जिससे उन्हें दस्त लग गए | उनका बुरा हाल हो गया और वे कुछ ही घंटो में निर्बल हो गए | 

अब उन्हें जब हार का ध्यान आया तो उन्होंने खुद से पूछा की ये चोरी मैंने क्यों की ? दिन ढलने को था, वह सन्यासी हार लेकर महल वापस गया और राजा से माफ़ी मांगी की मैंने चोरी की थी | राजा ने आश्चर्य से कहा - जब वापस ही लाना था तो ले क्यों गए थे ? 
 
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सन्यासी ने कहा - राजन, क्रोध न करना, 30 दिनों तक मैं तुम्हारा अन्न खाता रहा जिससे मेरा मन पापी हो गया है | जंगल में मेरा पेट साफ हुआ तब मेरा शरीर शुद्ध हुआ और तुम्हारे अन्न का प्रभाव समाप्त हुआ | मैं अब जाकर फिर से पहले जैसा हो गया हूँ | 

अन्न को जिस भावना से कमाया हो और तैयार किया गया हो उसका प्रभाव सीधे ही मन और बुद्धि पर पड़ता है | इसलिए कहा गया है - जैसा खाओगे अन्न, वैसा रहेगा मन | 

यदि आपको जीवन में महान चरित्र चाहिए तो आपको अपने आहार को सही रखना पड़ेगा क्योंकि जितना शुद्ध आपका आहार होगा, उसी के अनुरूप आपके शरीर में ऊर्जा बढ़ती या जमा होती चली जाएगी | 
एक असली विजेता पहले खेल को जीतने की ख्वाहिश नहीं करता बल्कि खेल को समझने की कोशिश करता है !!

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